श्री श्री 1008 श्री सगसजी बावजी (श्री सुल्तानसिंह जी) सर्वऋतु विलास, उदयपुर (राजस्थान)
ॐ नमः शिवाय जय एकलिंगनाथ
गौ, ब्राह्मण प्रतिपाल हो, दानी करण समान. या कुल की रीत है, जानत है सब संसार. जो दृढ राखे धर्म को, ताहि राखे करतार. रघुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाए पर वचन ना जाई. दाता के दरबार में, कमी काहू की नाय. बन्दा भोजन पावत है, चूक चाकरी माय. गौ, ब्राह्मण प्रतिपाल हो, दानी करण समान. मात तू ही, गुरु तात् तू ही, मित्र तात् तू ही, धन धान हमारो. ईश तू ही, जगदीश तू ही, मम शिश तू ही, प्रभू राखन वारो. राव तू ही, उमराव तू ही, मम भाव तू ही, प्रभू नैणन को तारो. सार तू ही, सरकार तू ही, घर-बार तू ही, परिवार हमारो. दाता नन्दन करत है विनति, आप ही हो प्रभू मेरो राखन वारो.